भारत और दुनिया में पानी का यह हाल रुला देगा | Rivers at Risk: Water Crisis | DW Documentary हिन्दी



पानी कम हो रहा है, लेकिन दुनियाभर में इसकी मांग बढ़ती ही जा रही है. मानवता अपने सबसे अहम संसाधन को लेकर गंभीर विवादों का सामना कर रही है. हमारे रहन-सहन का पृथ्वी के जल चक्र (वॉटर साइकल) पर क्या असर पड़ रहा है?

चार महाद्वीपों की छह नदियों के साथ यह डॉक्यूमेंट्री इस सवाल की तह तक जाती है कि पानी इतनी तेज़ी से कम क्यों हो रहा है और इसका ज़िम्मेदार कौन है? 70 फ़ीसदी मीठे पानी की खपत खेती में होती है. और इस 70 फ़ीसदी पानी का एक बड़ा हिस्सा जानवरों के चारे के उत्पादन में ख़र्च होता है.

मांस की हमारी बेतहाशा खपत भी काफ़ी हद तक स्पेन की एब्रो या अमेरिका और मेक्सिको की कोलोराडो जैसी बड़ी नदियों के सूखने के लिए ज़िम्मेदार है. फ़ैक्ट्री फ़ार्मिंग बिज़नेस बड़ी कृषि कंपनियों के लिए अरबों डॉलर कमाने का ज़रिया है, लेकिन ये कंपनियां पानी के भारी इस्तेमाल के साथ-साथ उसे गंदा करने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं.

यूरोप ने ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को भारत जैसे देशों को आउटसोर्स कर दिया है. दुनियाभर के जल प्रदूषण का लगभग 20 फ़ीसदी कपड़ा उद्योग के कारण होता है. यह फ़िल्म भारत के कारख़ानों और दूषित तत्व छोड़े जाने वाली जगहों के आसपास बसे लोगों की ज़िंदगी पर रोशनी डालती है.

लेकिन सब कुछ बुरा ही नहीं हो रहा है. फ़िल्म में हम ऐसे लोगों से भी मिले, जो हल ढूंढ रहे हैं. फ़्रांस में नदियों को बहाल करने के लिए बांधों को तोड़ा जा रहा है. मिस्र के एक ओएसिस में लोग हाइड्रोपोनिक्स के साथ प्रयोग कर रहे हैं. वहीं भारत में एक शख़्स, जिन्हें ‘जल पुरुष’ कहा जाता है, दशकों पहले सूख चुके रेगिस्तान में नदियों को वापस लाने के लिए हज़ारों साल पुरानी तकनीक इस्तेमाल कर रहे हैं.

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